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  • Shahzaad Hussain

ग्रामीण परिवेश और मानसिक स्वास्थ्य : एक नजर

"स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का वास होता है” World Health Organization (WHO) के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति वह है जो शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक, तीनो दृष्टिकोण से स्वस्थ हो, मात्र शारीरिक बीमारियों से मुक्त होना ही अच्छे स्वास्थ्य को नहीं दर्शाता है l


लगभग 25% भारतीय आबादी सामान्य मानसिक विकारों (common mental disorders [CMD]) का अनुभव करती है, लेकिन इनमें से बहुत कम प्रतिशत लोग ही मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त कर पाते हैं (1), जिसका प्रमुख कारण समाज में फैली हुई मानसिक स्वास्थ्य संबंधित विभिन्न प्रकार की गलतफमियां एवं बाधाएं हैं।


भारत एक ग्रामप्रधान देश है जिसकी अधिकतर आबादी गांवों में निवास करती है l मैं स्वयं एक ग्रामीण परिवेश से आता हूँ तथा वर्तमान में इस लेख के माध्यम से कुछ उन समस्याओं पर प्रकाश डालना चाहता हूँ जो मैंने व्यक्तिगत रूप से अपने ग्रामीण परिवेश में देखी हैं । भारतीय समाज में मानसिक रोग और इससे जुड़ी समस्याएं आज भी शर्म की बात मानी जाती हैं। लोग इसके बारे में खुल कर बात नहीं करते। मानसिक रोगी को ‘पागल’ कहकर उसकी बीमारी को ही खारिज कर देते हैं। खासकर, ग्रामीण इलाकों में इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता है |


ग्रामीण परिवेश में ज़्यादातर मानसिक स्वास्थ्य रोगों को शंका की नजर से देखा जाता है | इसके अलावा मुख्यतः यह धारणा मान ली जाती है कि मानसिक विकार कोई बीमारी नही है अपितु भूत प्रेत का प्रकोप है | कुछ स्थानों पर तो गंभीर मानसिक रोगियों को डायन और चुड़ैल का साया समझ घर के बाहर पेड़ एवं खम्बों से बांध कर एक लाचार जिंदगी की और धकेल दिया जाता है।


बेशक उपरोक्त वर्णित बातें आपको विचलित कर सकती है लेकिन यह कुछ वास्तविकताएं है जो हमें ग्रामीण परिवेश में देखने को मिलती हैं। इन सभी समस्याओं का प्रमुख कारण है - जागरूकता की कमी एवं भ्रांतियां l उपरोक्त वर्णित भ्रांतियो के अलावा लोगो की एक अन्य धारणा यह भी है कि इस प्रकार की स्थिति अनुशासन एवं इच्छा की कमी के कारण उत्पन्न होती है | ना तो समाज के वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित लोग, ना ही अन्य लोग इस विषय पर गम्भीर चर्चा करते हैं और ना ही लोगों को मानसिक समस्या के लक्षणों की जानकारी होती है।



सेवा उपलब्धता में कमी- देश के छोटे कस्बों और गांवों में बहुत से ऐसे युवक और युवतियां मिल जाएंगे, जिन्हें तुरंत मदद और इलाज की जरूरत है। लेकिन पहले तो उन्हें अपने आसपास बेहतर इलाज की सुविधा नहीं मिलती| दूसरी ओर परिवार के सदस्य यह मान कर चलते हैं कि अगर इलाज कराया, तो लोग रोगी को ‘पागल’ कहेंगे - इससे उसके भविष्य, जैसे शादी-ब्याह, नौकरी-चाकरी आदि पर बहुत असर पड़ेगा। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और उपचार के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी एक बहुत बड़ी चुनौती है, इसके साथ साथ ग्रामीण स्तर पर सरकारी कार्यक्रमों एवं सेवाओं की पहुंच अत्याधिक सीमित होने के कारण लोगों तक समस्त जानकारियां नही पहुंच पाती जिस कारण वह उन भ्रांतिया की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं |


पिछले कुछ सालों में बदलती परिस्तिथियों, आधुनिक जीवन-शैली, लगातार असफलताओं के कारण और बढ़ती बेरोजगारी के कारण ग्रामीण इलाकों में मानसिक समस्याएं अपने पैर फैला चुकी हैं | ऐसे में सरकारी और गैर सरकारी संगठन, स्वास्थ्य सेवाओं की अन्तिम पंक्ति मे काम करने वाली स्वास्थ्य आशा कार्यकर्ता, नर्स, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आदि को मानसिक स्वास्थ्य परामर्श के तकनीकी कौशल सिखा कर अधिक से अधिक मानसिक सेवाओं की उपलब्धता बढ़ा कर लागत भी कम कर सकते हैं |


इसके साथ साथ व्यक्तिगत स्तर पर गैर सरकारी संगठनों की मदद से ग्रामीण स्तर पर नुक्कङ नाटक, रेडियो कार्यक्रमों एवं विद्यालय स्तर पर जागरूकता के माध्यम से समाज मे फैली हुई मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ीं गलतफहमियों को दूर कर सकते हैं |



References

1. Increasing use of mental health services in remote areas using mobile technology: a pre-post evaluation of the SMART Mental Health project in rural India

(https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC5370210/)

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